डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर से आप क्या समझते हैं?

पावर तथा डिसटीब्यूशन ट्रांसफॉर्मर की संरचना लगभग समान होती है ।और पावर ट्रांसफार्मर की kVA क्षमता सामान्यतः3.15 MVAसे 200 MVA तक होती है और इसकी प्राइमरी वाइंडिंग्स स्टार- संयोजन में तथा सेकेंडरी वाइंडिंग डेल्टा- संयोजन में संयोजित होती है।

डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर की kVA क्षमता 25 kVA से 200 KVA तक होती है और इसकी प्राइमरी वाइंडिंग डेल्टा- संयोजन में तथा सेकेंडरी वाइंडिंग स्टार – संयोजन मैं संयोजित होता है। डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर के सेकेंडरी वाइंडिंग को स्टार- संयोजन में संयोजित करने का मुख्य लाभ यह है कि इससे थ्री फेज सप्लाई के साथ-साथ सिंगल फेज सप्लाई भी प्राप्त की जा सकती है।

  डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर मैं कितने भाग होते हैं: 

  1. क्रोड,
  2. प्राइमरी वाइंडिंग्स,
  3. सेकेंडरी वाइंडिंग्स,
  4. आयल टैंक,
  5. ट्रांसफार्मर आयल,
  6. कूलिंग पाइप,
  7. आयल इनलेट वाल्व,
  8. आयल आउटलेट ड्रेन कॉक,
  9. आयल गेज,
  10. प्राइमरी टर्मिनल,
  11. सेकेंडरी टर्मिनल्स,
  12. अर्थ पॉइंट,
  13. डाटा प्लेट,
  14. एक्सप्लोजन वेंट,
  15. कंजरवेटर,
  16. ब्रीदर,
  17. सिलिका जैल,
  18. टैपिंग स्विच,
  19. बुकोल्ज रिले तथा,
  20. तापमापी।
डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर से आप क्या समझते हैं?

पॉवर/डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफॉर्मर की सुरक्षा युक्तियाँ (Safety Devices of PowerDistribution Transformer)

ट्रांसफॉर्मर के उपरोक्त वर्णित भागों में से कंजरवेटर, ब्रीदर, तापमापी, एक्सप्लोजन वैंट, बकोल्ज रिले, ऑयल गेज, टैपिंग स्विच आदि उसकी सुरक्षा युक्तियाँ कहलाती हैं।

core

इसका उद्देश्य फ्लक्स को आसान रास्ता प्रदान करना है तथा इस पर ही वाइंडिंग की जाती है यहां परतदार silicon steel का बना होता है जिसकी चुंबक्शील तो उच्च होती है जिसके कारण एड्डी करंट व हिस्टेरेसिसक् क्षति कम होता है इसका लेमिनेशन की मोटाई 0.25-0.5mm होती है

प्राइमरी वाइंडिंग

यह तांबे का बना होता है यह स्त्रोत से जुड़ा होता है

सेकेंडरी वाइंडिंग

यह भी तांबे का बना होता है यह लोड से जुड़ा होता है

कन्जरवेटर (Conservator)

यह एक छोटा ऑयल टैंक है जो मुख्य ऑयल टैंक (ट्रॉसफॉर्मर की बॉडी) के ऊपर स्थापित होता है। इसमें, लगभग आधे स्तर तक ट्रांसफॉर्मर ऑयल भरा होता है और इसी टैंक में “ऑयल गेज” लगाया जाता है। कन्जरवेटर के मुख्य कार्य निम्न प्रकार है-

  • (i) मुख्य टैंक में तेल के स्तर को बनाए रखना।
  • (ii) तेल का तापमान बढ़ने से उसके आयतन में होने वाले फैलाव को स्थान देना (वाइण्डिग्स में पैदा होने वाली ऊष्मा के कारण तेल का तापमान 20°C से 95°C तक परिवर्तित होता है )
  • (iii) जब तेल ठंडा होकर सुकड़ता है तो उस समय कन्जरवेटर, मुख्य टैंक को तेल की आपूर्ती करता है और साथ ही नमी को तेल में नहीं पहुँचने देता

ब्रीदर (Breather)

जब ट्रांसफॉर्मर ऑयल ठंडा होकर सिकुड़ता है तो कन्जरवेटर के रिक्त हुए स्थान की पूर्ति वायुमण्डल की वायु से होती है; यह क्रिया श्वास लेना ( breathing) कहलाती है। इस प्रक्रिया में वायुमण्डल की नमी तेल में प्रवेश कर सकती है और उसके अचालक गुण को घटा सकती है। तेल में नमी के प्रवेश को रोकने के लिए ही ब्रीदर प्रयोग किया जाता है,

ब्रीदर में वायु की नमी सोखने के लिए ‘सिलिका जैल’ रखी जाती है। यह रंग में सफेद होती है। और नमी सोख लेने के बाद आसमानी नीले रंग की हो जाती है। ब्रीदर की संरचना चित्र में दर्शाई गई है। जब लगभग सारी सिलिका जैल का रंग, आसमानी नीला हो जाता है तो उसे परिवर्तित कर दिया जाता है। कुछ अन्य प्रकार के ब्रीदर में रबर डायफ्राम, थर्मोसाइफन फिल्टर,गैस कुशन आदि प्रयोग किए जाते हैं परन्तु सिलिका जैल का प्रयोग अधिक प्रचलित है।

मुख्य टैंक

यह ट्रांसफार्मर का मुख्य टैंक होता है इसमें ही तेल भरा रहता है जिसमें क्रोड तथा उसे पर लगाती हुई वाइंडिंग डूबी हुई होती है

तापमापी (Temperature Gauge)

ट्रांसफॉर्मर ऑयल का तापमान नापने के लिए मुख्य टैंक में एक तापमापी लगाया जाता है, । ट्रांसफॉर्मर ऑयल का तापमान 100°C से अधिक नहीं बढ़ने देना चाहिए और ट्रांसफॉर्मर को विसंयोजित कर उसकी शीतलन प्रणाली आदि में दोष खोजना चाहिए।नाले की नलीचित्र ब्रीदर- एयर इनलेट ऑयल सील

एक्सप्लोजन वैंट (Explosion valve)

यह सुरक्षा युक्ति कन्जरवेटर को मुख्य टैंक से जोड़ने वाले पाइप पर स्थापित की जाती है। यदि किसी दोष के कारण ट्रांसफॉर्मर ऑयल पर दबाव बहुत अधिक बढ़ जाए तो ऐसी स्थिति में मुख्य टैंक तथा कंजरवेटर की सुरक्षा के लिए एक्सप्लोजन वैंट लगाया जाता है।

इसे प्रेशर रिलीज वाल्व (pressure release valve) भी कहते हैं। तेल का दाब, निर्धारित मान से अधिक हो जाने पर इसका डायफ्राम टूट जाता है और अतिरिक्त तेल बाहर निकल जाता है।

ऐसी स्थिति में ट्रांसफॉर्मर के दोष को दूर कर नया वाल्व लगाया जाता है।

बकोल्ज रिले (Buchholz Relay)

एक्सप्लोजन वैंट तथा बकोल्ज रिले एक स्थान पर स्थापित होते हैं, देखें चित्र। बकोल्ज रिले, मुख्य सुरक्षा युक्ति है जो ट्रांसफॉर्मर में आन्तरिक दोष पैदा हो जाने की स्थिति की सूचना एक ‘एलार्म-बैल’ बजाकर देती है और साथ ही ट्रांसफॉर्मर को स्रोत से विसंयोजित कर देती है। इसकी संरचना चित्र में दर्शाई गई है। सामान्यतः इसका उपयोग, अधिक क्षमता वाले ट्रांसफॉर्मर्स में ही किया जाता है

इस रिले में दो ‘फ्लोट’ A तथा B होते हैं और इनसे जुड़े दो मरकरी स्विच होते हैं। जब तेल में ऊष्मा के कारण गैस अधिक पैदा हो जाती है। तो फ्लोट A नीचे गिर जाता है जिससे एक विद्युत घण्टी प्रचालित हो जाती है जो ट्रांसफॉर्मर की इस स्थिति की सूचना देने का कार्य करती है।

इसके अतिरिक्त, यदि तेल बहुत अधिक गर्म हो जाए (100°C से अधिक) तो वह तीव्रता से कन्जरवेटर की ओर जाता है।

तेल की तीव्र गति के कारण फ्लोट B, दूसरे मरकरी स्विच के द्वारा ट्रांसफॉर्मर को स्रोत से विसंयोजित कर देता है। यह स्विच एक ‘सर्किट ब्रेकर’ की भाँति कार्य करता है।

ऑयल गेज (Oil Guage)

कन्जरवेटर में उपस्थित तेल का स्तर दर्शाने के लिए उसमें एक ऑयल गेज लगाया जाता है।

टैपिंग स्विच (Tapping Switch)

ट्रांसफॉर्मर की आउटपुट वोल्टेज को नियत मान पर रखने के लिए टैपिंग स्विच प्रयोग किया जाता है। यह एक हस्त चालित स्विच/कन्ट्रोल होता है जो सेकण्डरी वाइण्डिग की विभिन्न टैपिंग्स से संयोजित होता है।

इस स्विच के द्वारा वोल्टेज को आवश्यकतानुसार घटाने/बढ़ाने के लिए सेकण्डरी वाइण्डिग्स के टर्न्स को घटाया/बढ़ाया जाता है। टैपिंग स्विच को टैप-चेंजर भी कहते हैं।

Bushing

ट्रांसफार्मर में bushing ट्रांसफार्मर के बाहर निकलने वाला तार को ढकने के लिए प्रयोग किया जाता है हाई वोल्टेज winding की तरफ bushing की लंबाई अधिक होती है low वोल्टेज की तरफ की लंबाई कम होती है वोल्टेज के आधार पर इसकी साइज का निर्धारण किया जाता है

Leave a Comment